अब जब आ पहुंचा हूँ
शब्द के किनारे
शब्द कि शांत और स्थाई मुद्रा से भी
छिटक चुका है मेरा विश्वास
मैं सीखना चाहता हूँ
संकेत और मौन का
आदिम व्याकरण
पा लेना चाहता हूँ वह क्षमता
जो हर चीज़ का नामकरण करती चली गई
ताकि लौट कर कर सकूं
हर चीज़ का अनामकरण
ताकि जो जैसा है
वैसा ही दिखने लगे
न कि
जैसा उसे दिखना चाहिए
ताकि प्यार प्यार हो
न कि दासता का बंधन
ताकि ईश्वर ईश्वर हो
न कि जड़ों तक उतरा हुआ डर
ताकि स्वतंत्रता स्वतंत्रता हो
न कि दीन और धर्म और कानून के
मछुआरे जाल
ताकि जीवन जीवन हो
न कि दुखों की अनचाही फसल
प्रस्तुतकर्ता shyam1950 पर ६:३९ PM
लेबल: श्याम
1 टिप्पणियाँ:
ushma ने कहा…
bahut sunder hai yah kvita !kitni vivshta!
kitni chhatptahat ! mukti ki chah sisak rhi hai !
taki jiwan jiwan ho,n ki dukhon ki anchahi fasal !
३ जनवरी २०१० ९:४७ PM
SHYAM 1950 shabd
बुधवार, 16 दिसम्बर 2009
बुधवार, 2 दिसम्बर 2009
फलो फूलो ओ पृथ्वी
शायद
यह पृथ्वी
मरू की अनंतता में
जीवन की आहट है
शायद
किसी और सौरमंडल के
किसी ग्रह उपग्रह को
मेरी प्रतीक्षा है
शायद
किसी दिन
हरा भरा होगा ब्रह्मांड
फलो फूलो ओ पृथ्वी
यह पृथ्वी
मरू की अनंतता में
जीवन की आहट है
शायद
किसी और सौरमंडल के
किसी ग्रह उपग्रह को
मेरी प्रतीक्षा है
शायद
किसी दिन
हरा भरा होगा ब्रह्मांड
फलो फूलो ओ पृथ्वी
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देखते ही देखते
देखते ही देखते
कैसे पक जाते हैं फल
पीले पड जाते हैं पत्ते
मौसम बदल जातें हैं
कितना रह जाता है
जस का तस
बस देखते ही देखते
कैसे पक जाते हैं फल
पीले पड जाते हैं पत्ते
मौसम बदल जातें हैं
कितना रह जाता है
जस का तस
बस देखते ही देखते
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मंगलवार, 24 नवम्बर 2009
तू मेरी चाय गरमा गर्म
मैं तेरा कप ताप हरण
धीमे धीमे पी जाती है तू
चुस्कियों में
मुझे करते हुए रिक्त
और मैं रख दिया जाता हूँ
वाश बेसन में
धुलने के लिए
मैं तेरा कप ताप हरण
धीमे धीमे पी जाती है तू
चुस्कियों में
मुझे करते हुए रिक्त
और मैं रख दिया जाता हूँ
वाश बेसन में
धुलने के लिए
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रविवार, 1 नवम्बर 2009
शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009
कविता के सन्दर्भ में
तुम तो
संकेत का सौन्दर्य हो
व्यक्त अव्यक्त का अद्भुत संतुलन
बादलों की ओट में धूप की अदा
या पहाड़ का मौसम
अब तो तुम हो और यह दिल
अब तो तुम हो और ये आँखें
अब तो तुम हो बस तुम !
संकेत का सौन्दर्य हो
व्यक्त अव्यक्त का अद्भुत संतुलन
बादलों की ओट में धूप की अदा
या पहाड़ का मौसम
अब तो तुम हो और यह दिल
अब तो तुम हो और ये आँखें
अब तो तुम हो बस तुम !
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