बुधवार, 13 जनवरी 2010

लौटते हुए

अब जब आ पहुंचा हूँ
शब्द के किनारे
शब्द कि शांत और स्थाई मुद्रा से भी
छिटक चुका है मेरा विश्वास
मैं सीखना चाहता हूँ
संकेत और मौन का
आदिम व्याकरण
पा लेना चाहता हूँ वह क्षमता
जो हर चीज़ का नामकरण करती चली गई


ताकि लौट कर कर सकूं
हर चीज़ का अनामकरण
ताकि जो जैसा है
वैसा ही दिखने लगे
न कि
जैसा उसे दिखना चाहिए


ताकि प्यार प्यार हो
न कि दासता का बंधन

ताकि ईश्वर ईश्वर हो
न कि जड़ों तक उतरा हुआ डर

ताकि स्वतंत्रता स्वतंत्रता हो
न कि दीन और धर्म और कानून के
मछुआरे जाल

ताकि जीवन जीवन हो
न कि दुखों की अनचाही फसल


प्रस्तुतकर्ता shyam1950 पर ६:३९ PM

लेबल: श्याम

1 टिप्पणियाँ:

ushma ने कहा…
bahut sunder hai yah kvita !kitni vivshta!
kitni chhatptahat ! mukti ki chah sisak rhi hai !
taki jiwan jiwan ho,n ki dukhon ki anchahi fasal !

३ जनवरी २०१० ९:४७ PM















बुधवार, 16 दिसम्बर 2009

प्यार


क्या प्यार हीरा है
इतना चमकदार
इतना कठोर

आखिर तो
कालिख से ही
जन्म लेता है

इससे
और अधिक
क्या उम्मीद
की जा सकती है

बुधवार, 2 दिसम्बर 2009

फलो फूलो ओ पृथ्वी

शायद
यह पृथ्वी
मरू की अनंतता में
जीवन की आहट है

शायद
किसी और सौरमंडल के
किसी ग्रह उपग्रह को
मेरी प्रतीक्षा है

शायद
किसी दिन
हरा भरा होगा ब्रह्मांड

फलो फूलो ओ पृथ्वी

देखते ही देखते

देखते ही देखते
कैसे पक जाते हैं फल
पीले पड जाते हैं पत्ते
मौसम बदल जातें हैं
कितना रह जाता है
जस का तस
बस देखते ही देखते

मंगलवार, 24 नवम्बर 2009

तू मेरी चाय गरमा गर्म


मैं तेरा कप ताप हरण

धीमे धीमे पी जाती है तू
चुस्कियों में

मुझे करते हुए रिक्त

और मैं रख दिया जाता हूँ
वाश बेसन में

धुलने के लिए


रविवार, 1 नवम्बर 2009

मेरे बिना

तुम
कमल ही सही
मैं
कीचड़ ही सही
पोषण तो मुझ ही से लोगे
मेरे बिना जियोगे कैसे

मैं था
तेरे बिना भी था
रहूँगा
तेरे बिना भी रहूँगा
पर तेरा क्या होगा कमल
मेरे बिना

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009

कविता के सन्दर्भ में

तुम तो
संकेत का सौन्दर्य हो
व्यक्त अव्यक्त का अद्भुत संतुलन

बादलों की ओट में धूप की अदा
या पहाड़ का मौसम

अब तो तुम हो और यह दिल
अब तो तुम हो और ये आँखें
अब तो तुम हो बस तुम !